Poems

जरा सोचो

तुम आधिकारों की बात करो
वे कर्त्तव्य तुम्हें सिखलाते हैं।
तुम संवैधानिक रस्तों पर कर्म करो
वो तुम्हें कुचलते जाते हैं।
क्या इस दिन खातिर
लोकतंत्र का ढांचा खड़ा किया होगा
लोकतंत्र में लोग न खुश हो
तो कैसा लोकतंत्र होगा
कहीं आवाज उठाने पर
लोग लाठियां झेल रहे
अपने आधिकारों खातिर
कृषक फसल को फूंक रहे
ये कैसा है लोकतंत्र जहां
सत्ता को कर्ण नहीं होते
बिना लाठियां मार लिये
ये वार्ता तक नहीं करते

जरा सोचो

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